Wednesday, September 12, 2007

साया........

फिर किसी याद ने रात भर है जगाया मुझ्को क्या सज़ा दी है मोहबत ने खुदाया मुझको
दिन को आराम है ना रत को है चेन कभी जाने किस ख़ाक से कुदरत ने बनाया मुझको
दुःख तो यह है कह ज़माने मैं मिले घिर सभिजो मिला है वोह मिला बन के पराया मुझको
जब कोई भी ना रह कन्धा मेरे रोने कोघर कि दीवारों ने सीने से लगाया मुझको
अब तो उम्मीद-ए-वफ़ा तुम से नहें है कोइफिर चराँगो कि तरह किस ने जलाया मुझको
बेवफा जिन्दगी ने जब छोर दिया है तान्हामौत ने प्यार से पहलू मैं बिठाया मुझको
वोह दिया हूँ जो मोहब्बत ने जलाया था कभिघम कि आंधी ने सुबह और शाम बुझाया मुझको
कैसे भूलों गा तेरे साथ गुजरा लम्हा याद आता रह जुल्फों का ही साया मुझको.....

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