साँसे चुभती हैं
साँसे चुभती हैं
साँसे चुभती हैं मेरे सीने मई खंजर कि तरह
जिन्दगी लगती है अब दूर के मंजर कि तरह
एक भी कतरा मुहब्बत का मुकद्दर ना बना
हम भटकते रहे दुनिया मैसमंदेर कि तरह
दूर तक अपने सिवा कुछ भी ना देखा उसने
हम खडे रह गए बस्स राह केमंजर कि
उनकी यादों से कहो कोई नया घरढूँढें
जिंदगी अपनी है गिरते हे खंडहर कि तरह
Labels: Shayari

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